गल्फ टकराव: सिर्फ तेल नहीं, पांच दिशाओं से दबाव में भारत, आम लोगों पर बढ़ सकता है बोझ

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर इस बार भारत पर केवल पेट्रोल-डीजल की कीमतों तक सीमित नहीं रहने वाला है। हालात ऐसे हैं कि अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था कई मोर्चों पर दबाव झेल सकती है और अंततः इसका भार आम नागरिकों की जेब पर पड़ेगा।

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Gulf Crisis in India

पश्चिम एशिया (गल्फ टकराव)में बढ़ते तनाव का असर इस बार भारत पर केवल पेट्रोल-डीजल की कीमतों तक सीमित नहीं रहने वाला है। हालात ऐसे हैं कि अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था कई मोर्चों पर दबाव झेल सकती है और अंततः इसका भार आम नागरिकों की जेब पर पड़ेगा।

ईरान की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और उसके आक्रामक रुख ने खाड़ी क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। कई देश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस टकराव में शामिल हो चुके हैं। इन देशों से भारत के गहरे व्यापारिक संबंध हैं और लगभग 90 लाख भारतीय वहां रोजगार से जुड़े हैं। ऐसे में यह संकट भारत के लिए बहुआयामी चुनौती बन गया है।

सबसे बड़ा झटका ऊर्जा आपूर्ति को लगा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली वैश्विक तेल और गैस सप्लाई प्रभावित हुई है, जिसके कारण कच्चे तेल की कीमतें 60 डॉलर से बढ़कर 80 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। प्राकृतिक गैस के दाम भी 45 – 50 प्रतिशत तक उछल गए हैं। लेकिन जोखिम सिर्फ ऊर्जा तक सीमित नहीं है।

पहला मोर्चा: होर्मुज और चालू खाते पर दबाव

Strait of Hormuz से भारत का लगभग आधा ऊर्जा आयात गुजरता है। यदि यहां लंबे समय तक बाधा बनी रहती है, तो भारत को वैकल्पिक स्रोतों से महंगा तेल-गैस खरीदना पड़ेगा। इससे चालू खाता घाटा बढ़ सकता है।

साथ ही खाड़ी देशों को होने वाला भारतीय निर्यात भी प्रभावित हो सकता है। दुबई के जेबेल अली पोर्ट पर हमलों के बाद शिपिंग और बीमा लागत पहले ही बढ़ चुकी है, जिससे व्यापार महंगा पड़ रहा है।

दूसरा मोर्चा: रुपया, महंगाई और ब्याज दरों का खतरा

डॉलर के मुकाबले रुपया पिछले दो वर्षों में करीब 9 प्रतिशत कमजोर होकर 91.5 के आसपास पहुंच चुका है। यदि तेल 100 डॉलर प्रति बैरल की ओर बढ़ता है और रुपया 100 प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर के करीब जाता है, तो आयात महंगे होंगे और महंगाई तेज हो सकती है।

ऐसी स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक को ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव झेलना पड़ सकता है, जिससे लोन महंगे होंगे और निवेश की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।

तीसरा मोर्चा: सोना और सरकारी वित्त पर असर

यूक्रेन संकट के बाद से सोने की कीमतों में भारी उछाल आया है। भारतीय परिवार अस्थिरता के दौर में सोने को सुरक्षित निवेश मानते हैं, जिससे मांग और बढ़ सकती है।

सरकार द्वारा जारी गोल्ड बॉन्ड योजनाओं के तहत लगभग 124 टन सोने के बराबर देनदारी अब भी शेष है, जिनकी परिपक्वता 2032 तक है। यदि सोने के दाम और बढ़ते हैं, तो सरकार का राजकोषीय बोझ बढ़ सकता है।

चौथा मोर्चा: खाद सुरक्षा और सब्सिडी

Qatar से आने वाली एलएनजी भारत के उर्वरक उद्योग के लिए अहम है। आपूर्ति बाधित होने पर खाद उत्पादन प्रभावित हो सकता है।

ऐसे में सरकार को या तो सब्सिडी बढ़ानी पड़ेगी या किसानों की नाराजगी का सामना करना पड़ेगा। अनुमान है कि खाद सब्सिडी का बोझ पहले से ही अरबों डॉलर के स्तर पर है।

पांचवां मोर्चा: पूंजी प्रवाह और कूटनीतिक संतुलन

United Arab Emirates भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक और निवेश साझेदार है। इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात के लिहाज से यह अमेरिका के बाद बड़ा बाजार है। दुबई और अबू धाबी भारतीय निवेशकों के पसंदीदा ठिकाने रहे हैं।

यदि खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है, तो निवेश सिंगापुर या हांगकांग जैसे केंद्रों की ओर शिफ्ट हो सकता है। साथ ही, रूस से तेल आयात को लेकर वैश्विक दबाव बढ़ने पर व्यापारिक टैरिफ का जोखिम भी उभर सकता है।

आम आदमी पर ‘डबल अटैक’ कैसे?

यह संकट तेल, रुपया, रेमिटेंस, सोना, खाद और विदेशी निवेश, सभी पर असर डाल सकता है। यदि हालात जल्दी सामान्य नहीं हुए, तो महंगाई और ब्याज दरों में बढ़ोतरी की दोहरी मार पड़ सकती है।

महंगे लोन, बढ़ती कीमतें और धीमी आर्थिक वृद्धि मिलकर आम परिवारों की खर्च क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए यह संकट सिर्फ भू-राजनीतिक नहीं, बल्कि सीधा आर्थिक और सामाजिक प्रभाव डालने वाला साबित हो सकता है।

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